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महंगाई की मार: कंपनियां छोटे पैक का वजन घटाकर आपकी हल्की कर रही हैं जेब

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महंगाई बढ़ने के बाद भी चिप्स और नमकीन के पैकेट उसी दाम में खरीद रहे हैं तो इस भुलावे में मत रहिए कि वह सस्ते में मिल रहा है। कंपनियां छोटे पैक का वजन घटाकर आपकी जेब हल्की कर रही हैं। वहीं, बड़े पैकेट में मात्रा में कोई बदलाव नहीं करके ज्यादा कीमतें वसूल रही हैं यानी स्पष्ट संकेत है कि पैसे ज्यादा दो या कम माल लो। ग्राहक किसी भी आधार पर उत्पाद क्यों न खरीदे, उसके खाते में नुकसान ही है। अगर वह वजन के हिसाब से उत्पाद खरीदता है, तो दाम ज्यादा चुकाना होगा। एफएमसीजी कंपनियां महंगाई में तेज उछाल की वजह से उत्पादों की लागत में वृद्धि के नाम पर यह सब करने को मजबूर हैं। पिछले एक साल में खाद्य तेलों के दाम दोगुना से अधिक बढ़ गए हैं। वहीं अन्य कच्चे माल की कीमत बढ़ने से भी उत्पादों के दाम इन उत्पादों के वजन कम हुए

पेप्सिको इंडिया के पांच और 10 रुपये में मिलने वाले लेज और कुरकुरे के वजन में कटौती की गई है। पारले प्रोडक्ट लिमिटेड पांच और 10 रुपये वाले बिस्किट का वजन घटा चुकी है। वहीं, 30 रुपये और 50 रुपये वाले चिप्स के वजन में भी कटौती हुई है। वहीं, नमकीन के मामले में 400 ग्राम और एक किलो वाले पैकेट के दाम में इजाफा हुआ है। बिकानो के निदेशक मनीष अग्रवाल ने कहा कि फिलहाल 100 रुपये वाले पैकेट का वजन घटाया गया है। उनका कहना है कि लागत में वृद्धि के बाद विकल्प सीमित हैं। पारले प्रोडक्ट के सीनियर केटेगरी हेड मार्केटिंग कृष्णाराय बुद्धा का कहना है कि दाम बढ़ाने या वजन घटाने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है।

पर असर पड़ा है।

मुनाफा के लिए मात्रा पर कैंची

खाद्य उत्पाद के दाम आसमान छू रहे हैं और कंज्यूमर उत्पाद बनाने वाली कंपनियां मार्जिन बचाने के लिए मात्रा पर कैंची चला रही हैं। आईआईएफएल सिक्योरिटीज के उपाध्यक्ष (कमोडिटी एवं करेंसी) अनुज गुप्ता ने हिन्दुस्तान को बताया कि बीते एक साल में अधिकांश कमोडिटी की कीमतों में बड़ा उछाल आया है। इसके चलते एफएमसीजी कंपनियों की उत्पादन लगात बढ़ी है लेकिन वह कीमत बढ़ाने की स्थिति में नहीं है क्योंकि कोरोना के कारण बाजार में सुस्ती है। ऐसे में वो कीमत बढ़ाकर जोखिम लेना नहीं चाहते हैं। इसलिए वो उत्पाद को हल्का कर मुनाफा को बरकरार रखना चाहते हैं।

छोटे पैकेट का बड़ा बाजार

चिप्स,बिस्किट और नमकीन के छोटे पैकेट का बाजार ज्यादा बड़ा है। इसमें पांच रुपये और 10 रुपये के पैकेट का एक अलग उपभोक्ता वर्ग है जिसकी संख्या अधिक है। ऐसे में इस श्रेणी में दाम बढ़ाने का जोखिम कोई भी कंपनी नहीं लेना चाहती है। इस स्थिति में कंपनियों को मात्रा घटाकर उसी कीमत पर बेचना मुनाफे का सौदा लगता है। एफएमसीजी कंपनी के एक शीर्ष अधिकारी नें कहा कि इस श्रेणी के उत्पादों को काफी तैयारी के बाद बाजार में उतारा जाता है जिसपर भारी-भरकम खर्च होता है। इसमें सस्ते का भी आकर्षण होता है। यदि कीमत बढ़ाई जाती है तो फिर से उसकी ब्रांडिग करनी पड़ सकती है जो महंगा सौदा होता है। इसके अलावा आप कीमत बढ़ा देते हैं और दूसरी कंपनी वजह घटाकर उसी कीमत पर बेचने का फैसला करती है तो उससे आपके बाजार हिस्सेदारी खोने का डर होता है। ऐसे में वजन घटाना ही एकमात्र विकल्प होता है।

घर का बजट संभालना मुश्किल

देश के कई शहरों में गृहणियों ने हिन्दुस्तान को बताया कि घटी आय के बीच आसमान छूती महंगाई से घर का बजट संभालना मुश्किल हो गया है। सब्जियों, खाद्य तेल, फल, रसोई गैस आदि की कीमतों में आसमान बढ़ोतरी कोरोना के बाद से हुई है जिससे घर का बजट काफी बढ़ गया है। ऐसे में घर चलाना मुश्किल हो रहा है।

पेट्रोल-डीजल भड़का रहे महंगाई की आग

पेट्रोल-डीजल के दाम छह माह में 25 से 40 फीसदी बढ़े हैं। इससे मालभाड़ा 25 फीसदी बढ़ा है। इसका सीधा असर खाने-पीने से लेकर रोजर्मरा के उत्पादों पर हुआ है। इससे पहले कंज्यूमर ड्यूरेबल, ऑटा कंपनियों ने कीमतों में वृद्धि की थी। पिछले छह माह में टीवी-फ्रीज 20 फीसदी तक महंगे हुए। जबकि कार कंपनियां,छह माह में दो बार दाम बढ़ा चुकी हैं। मारुति ने सोमवार को फिर 15 हजार रुपये तक दाम बढ़ाने का किया ऐलान किया। महंगाई की मार से जरूरी सामानों की कीमत में बढ़ोतरी से उत्पादन लागत बढ़ी है।

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