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अफगानिस्तान को अरबों रुपये देने की तैयारी में है अमेरिका, पर कैसे होगी निगरानी

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अमेरिका अब अफगानिस्तान से निकलने के अंतिम चरण है। इस सबके बीच अमेरिका और नाटो ने अफगान सुरक्षा बलों को साल 2024 तक हर साल करीब 300 अरब रूपये देने का वादा किया है। यह पैसे इसलिए दिए जा रहे हैं ताकि अफगानिस्तान में तालिबान के बढ़ते प्रभाव को बेअसर किया जा सके।

अमेरिका पिछले करीब 20 सालों से अफगानिस्तान में है। उसका दावा है कि इन सालों में अफगानिस्तान सेना को ट्रेनिंग देने और हथियार मुहैया कराने में 6632 अरब रुपये खर्च किए गए हैं। अमेरिकी एजेंसियां इन पैसों के गलत इस्तेमाल की रिपोर्ट्स जारी करती रही हैं। कई रिपोर्ट्स में बताया गया है कि करोड़ों रुपये का गलत इस्तेमाल किया गया है और सुरक्षा तंत्र में पर्याप्त भ्रष्टाचार है। ऐसे में अब जब अमेरिका, अफगानिस्तान से जा रहा है तो पैसों की निगरानी का काम असंभव सा होगा।

2001 से अफगानिस्तान में अमेरिकी खर्च
अमेरिका का दावा है कि अफगानिस्तान की राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर पिछले 20 सालों में 620 अरब रुपये खर्च किए गए हैं। इसमें निर्माण, हथियार और ट्रेनिंग आदि शामिल हैं। अमेरिका ने गाड़ियों और एयरक्राफ्ट्स पर करीब 75 अरब रुपये खर्च किए हैं। 2010 से 2020 के दौरान अमेरिका ने गाड़ियों के तेल पर करीब 28 अरब रूपये खर्च किए हैं। 2022 के लिए अमेरिका ने अफगानिस्तान को 25 अरब रुपये देने की बात की है। इसमें से करीब 5 अरब रुपये सैनिकों के सैलरी के लिए है। यह देखना मुश्किल होगा कि 2024 के बाद अफगान सरकार अपनी सेना को कैसे पेमेंट कर सकेगी।

रिपोर्ट्स के मुताबिक़ अफगान सरकार के बजट का 80 फीसद से अधिक अमेरिका और अन्य देश पेमेंट करते हैं। रिपोर्ट्स बताती हैं कि आर्थिक अनुमानों से पता चलता है कि काबुल अधिक वित्तीय बोझ उठा सकता है, यह या तो गलत है या बहुत बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया है।

भ्रष्टाचार कहां?
पिछले दो दशकों में अमेरिका द्वारा अफगानिस्तान में खर्च किए पैसों की निगरानी सही तरीके से नहीं की गई है। उदाहरण के लिए अमेरिका ने अफगान वायु सेना के लिए करीब 4 अरब रुपये में 20 मिलिट्री ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट ख़रीदे लेकिन बाद में 16 को कबाड़ के भाव बेच दिए क्योंकि वह असुरक्षित थे। कई रिपोर्ट में अफगानिस्तान सेना को बढ़ाकर दिखाया गया है जो कि असल में हैं ही नहीं। ये सिर्फ पेपर्स पर हैं। इसे भ्रष्टाचार का जड़ बताया जाता रहा है। कई रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि निगरानी में कमी की वजह से भ्रष्टाचार में बढ़ोतरी होती गई और इससे अफगानिस्तान की सरकार कमज़ोर हुई और विद्रोही गुटों ने इसका फायदा उठाया।

किस तरह की सेना बची हुई है?
हाल के दिनों में तालिबान, अफगानिस्तान के कई जिलों में फ़ैल चुका है। पुलिस और सेना के कई जवानों को तालिबान वाले इलाके खाली करने पड़ रहे हैं। सरेंडर करना पड़ रहा है। अफगान अधिकारियों का कहना है कि अमेरिका ने उन्हें कभी भी खुद रखरखाव करने के लिए ट्रेनिंग या इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं दिया।

एपी से बात करने वाले कई अफगान अधिकारियों ने बताया है कि हरेक गोली अमेरिका से आ रहे थे। अमेरिका, अफगानिस्तान में क्यों नहीं बना रहा था? अधिकारियों ने बताया है कि अफगान सैनिकों को गलत तरीके से प्रशिक्षण दिया गया। उन्होंने वेस्टर्न स्टाइल में प्रशिक्षित किया लेकिन यहां तालिबान से लड़ने के लिए उस हिसाब से ट्रेनिंग की जरुरत थी। एक्सपर्ट्स बताते हैं कि अफगान कमांडो, स्पेशल फ़ोर्स और वायु सेना ने अच्छा प्रदर्शन किया है लेकिन अफगान थल सेना काम के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं दिखती।
किस तरह की सेना बची हुई है?
हाल के दिनों में तालिबान, अफगानिस्तान के कई जिलों में फ़ैल चुका है। पुलिस और सेना के कई जवानों को तालिबान वाले इलाके खाली करने पड़ रहे हैं। सरेंडर करना पड़ रहा है। अफगान अधिकारियों का कहना है कि अमेरिका ने उन्हें कभी भी खुद रखरखाव करने के लिए ट्रेनिंग या इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं दिया।

एपी से बात करने वाले कई अफगान अधिकारियों ने बताया है कि हरेक गोली अमेरिका से आ रहे थे। अमेरिका, अफगानिस्तान में क्यों नहीं बना रहा था? अधिकारियों ने बताया है कि अफगान सैनिकों को गलत तरीके से प्रशिक्षण दिया गया। उन्होंने वेस्टर्न स्टाइल में प्रशिक्षित किया लेकिन यहां तालिबान से लड़ने के लिए उस हिसाब से ट्रेनिंग की जरुरत थी। एक्सपर्ट्स बताते हैं कि अफगान कमांडो, स्पेशल फ़ोर्स और वायु सेना ने अच्छा प्रदर्शन किया है लेकिन अफगान थल सेना काम के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं दिखती।

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