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Vishwakarma Puja 2021 : विश्वकर्मा पूजा आज, जानें शुभ मुहूर्त और पूजन विधि

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बॉलीवुड एक्ट्रेस कल्कि केकला इन दिनों फैमिली वेकशन पर हैं। उनके वेकेशन की कुछ तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं। जिसमें वह अपनी बेटी साफो और बॉयफ्रेंड गाय हर्शब के साथ मस्ती करती हुई दिख रही हैं। हालांकि इस वेकेशन की तस्वीरों में एक्ट्रेस की क्यूट बेटी साफो पर लोग फिदा हो गये हैं। फोटो में साफो की प्यारी स्माइल देखकर आप पक्का अपना दिल हार जाएंगे।

विश्वकर्मा पूजा का मुहूर्त-
विश्वकर्मा दिवस, 17 सितंबर को एक घंटे 32 मिनट तक राहुकाल रहेगा। इस दौरान विश्वकर्मा पूजन की मनाही है। आदि शिल्पी की जयंती पर राहुकाल की शुरुआत पूर्वाह्न 10:43 बजे से होगी। दोपहर 12:15 बजे राहुकाल समाप्त होगा।

विश्वकर्मा पूजन में सूर्य की कन्या राशि में संक्रांति का विशेष महत्व है। इस वर्ष सूर्य की कन्या राशि में संक्रांति 17 सितंबर को दोपहर 1: 29 बजे होगी। ज्योतिषाचार्य पं. रामप्रवेश पांडेय के अनुसार औजारों, निर्माण से जुड़ी मशीनों, दुकानों, कल-कारखानों आदि में पूजन के लिए मध्याह्न 12:16 बजे से सूर्यास्त तक का समय उपयुक्त है। अच्छी बात यह है कि इस दिवस पर सर्वार्थसिद्धि योग भी बन रहा है। सर्वार्थ सिद्धि योग की शुरुआत प्रात: 06:07 बजे से होगी जो अगले दिन 18 सितंबर को भोर में 03:36 मिनट तक रहेगा। इस योग में विश्वकर्मा का पूजन विशेष रूप से फलदायी होगा।

कैसे करें पूजा
इस दिन अपने कामकाज में उपयोग में आने वाली मशीनों को साफ करें। फिर स्नान करके भगवान विष्णु के साथ विश्वकर्माजी की प्रतिमा की विधिवत पूजा करनी चाहिए। ऋतुफल, मिष्ठान्न, पंचमेवा, पंचामृत का भोग लगाएं। दीप-धूप आदि जलाकर दोनों देवताओं की आरती उतारें।

कथाएं
भगवान विश्वकर्मा के जन्म को लेकर शास्त्रों में अलग-अलग कथाएं प्रचलित हैं। वराह पुराण के अनुसार ब्रह्माजी ने विश्वकर्मा को धरती पर उत्पन्न किया। वहीं विश्वकर्मा पुराण के अनुसार, आदि नारायण ने सर्वप्रथम ब्रह्माजी और फिर विश्वकर्मा जी की रचना की। भगवान विश्वकर्मा के जन्म को देवताओं और राक्षसों के बीच हुए समुद्र मंथन से भी जोड़ा जाता है।

इस तरह भगवान विश्वकर्मा के जन्म को लेकर शास्त्रों में जो कथाएं मिलती हैं, उससे ज्ञात होता है कि विश्वकर्मा एक नहीं कई हुए हैं और समय-समय पर अपने कार्यों और ज्ञान से वो सृष्टि के विकास में सहायक हुए हैं। शास्त्रों में भगवान विश्वकर्मा के इस वर्णन से यह संकेत मिलता है कि विश्वकर्मा एक प्रकार का पद और उपाधि है, जो शिल्पशास्त्र का श्रेष्ठ ज्ञान रखने वाले को कहा जाता था। सबसे पहले हुए विराट विश्वकर्मा, उसके बाद धर्मवंशी विश्वकर्मा, अंगिरावंशी, तब सुधान्वा विश्वकर्मा हुए। फिर शुक्राचार्य के पौत्र भृगुवंशी विश्वकर्मा हुए। मान्यता है कि देवताओं की विनती पर विश्वकर्मा ने महर्षि दधीची की हड्डियों से स्वर्गाधिपति इंद्र के लिए एक शक्तिशाली वज्र बनाया था।
प्राचीन काल में जितने भी सुप्रसिद्ध नगर और राजधानियां थीं, उनका सृजन भी विश्वकर्मा ने ही किया था, जैसे सतयुग का स्वर्ग लोक, त्रेतायुग की लंका, द्वापर की द्वारिका और कलियुग के हस्तिनापुर। महादेव का त्रिशूल, श्रीहरि का सुदर्शन चक्र, हनुमान जी की गदा, यमराज का कालदंड, कर्ण के कुंडल और कुबेर के पुष्पक विमान का निर्माण भी विश्वकर्मा ने ही किया था। वो शिल्पकला के इतने बड़े मर्मज्ञ थे कि जल पर चल सकने योग्य खड़ाऊ बनाने की सामथ्र्य रखते थे।

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